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Hymn No. 2743 | Date: 20-Nov-2003
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तुम कहते हो और हम न करते है,
तुम कहते हो और हम न करते है,
कब तक चलेगा खेल मेरा, सुन सुनके न करने का।
ऐसा क्यों है सब जानते समझते हम न करते है,
क्या विश्वास की है कमीं, या अपने आप में हूँ मशरूफ।
बहुत चाहा चलना तेरी बतायी राहो पे, कश्मकश मैं बितायी समय,
संजीदगी मानो है ही नहीं, न ही है विश्वास अपने पे।
दासो हूँ तेरा फिर क्यों कल्पनाओं मैं विचरते भुला बैठता हूँ,
तुझसे दूर जाना अच्छा नहीं लगता, चाहके तेरे पास पहुँच नहीं पाता।
हर पल फरियादों का रोना रोना अच्छा नही लगता तेरे आगे,
पर इस चक्रव्यूह को तोड़ पाना मुश्किल होता जा रहा है मेरे लिये।


- डॉ.संतोष सिंह