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Hymn No. 2744 | Date: 10-Dec-2003
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खामियाजा, खामियाजा और कितना, इस तन मन को है भुगतना।
खामियाजा, खामियाजा और कितना, इस तन मन को है भुगतना।
तेरा कहा न करके और कितना, इस दुनिया में हमको है भटकना।
तेरे पास रहके है तुझसे, और कब तक दोराहों पे है चलना।
विश्वास के नाम पे कब तक अविश्वासों से भरा जीवन है जीना।
आशा और निराशा के पाटों के बीच रहते कब तक है पिसना।
मंजिल के नाम पे बेमंजिल की मुसाफिरी कब तक है करना।
कर्मों की सूली पे खुदको ओर तुझको कब तक चढ़ाते है रहना।
न जाने कितने सवाल है मनमैं, उनके जवाबों से कब तक है दूर रहना।
लूट चुका हूँ हर तरह से, क्या इसी तरह जिंदगी को अब है गुजारना।
जीवन के अनचाहे इन दौर से, कब तक मजबूर होके है जीना।


- डॉ.संतोष सिंह