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Hymn No. 2746 | Date: 11-Dec-2003
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जो बात है दिल की, उसे कहे बिना मैं कैसे रहूँ।
जो बात है दिल की, उसे कहे बिना मैं कैसे रहूँ।
जो प्रारब्ध का है लिखा, उसे बदले बिना मैं कैसे जियूँ।
लाख हौसला हो पस्त, तेरे पास पहुँचे बिना मैं कैसे रुकूँ।
बिगड़ा हुआ हूँ कितना भी, बदल बिना मैं तेरे पास कैसे पहुचूँ।
पल पल बीते जिंदगी, उसे रोके बिना मैं कैसे जियूँ जिंदगी।
जो हाथों मैं न है, उसे पाये बिना मैं कैसे चैन लूं।
दूर हूँ कितना भी तुझसे, विरह मैं तड़पे बिना मैं कैसे जियूँ।
दानत इतनी भी न बिगड़ी है, सुधार न सकूँ अपने आप को मैं।
मन की मनमानियाँ है इतनी, इनको मोड़s बिना तेरे ख्यालों मैं कैसे पहुचूँ।


- डॉ.संतोष सिंह