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Hymn No. 271 | Date: 11-Aug-1998
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ऐ। ज्ञान के स्वामी, प्रेमियों के प्रेमी, जो कूछ भी हो बस तुम्ही हो, तुम्हारे सिवाय कोई नहीं ।
ऐ। ज्ञान के स्वामी, प्रेमियों के प्रेमी, जो कूछ भी हो बस तुम्ही हो, तुम्हारे सिवाय कोई नहीं ।
अपना सब कुछ तुमसे, धुल जाता है सब कुछ तूममें, नित्य नये – नये खेल खेलते हो।
कहीं बाँधा है खुद को नियम और तौर तरीको में, कभी खुदही आके तोड़ डाला हर नियम को।
कहूँ क्या में तुझसे, क्यों कहना चाहूँ, नजर जब तेरी नजरों से मिलती है तो चुप हो जाता हूँ मैं।
खालीपन मन में आता है क्या हम तेरे लायक नहीं, क्यों नहीं अपनाते तेरे बतायें रास्ते ।
हर पल तन की अनुकूलता क्यों है ढूँढ़ते, ढूँढते, ढूँढ़ते तन पे तन बदलते रहते है हम।
अपनी कायरता के लिये दोष देते है तूझे, रीविहीन तन लेकें, शब्दों का मायाजाल खड़ा करते है ।
आशीर्वाद नहीं अब तेरा श्राप चाहिये, सर माथे पे रखूँगा तेरा तोहफा समझकें ।


- डॉ.संतोष सिंह