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Hymn No. 272 | Date: 12-Aug-1998
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हर पल तोड़ा मैंने सबके ख्वाबो को, लोगों ने संजोया कई-कई सालों से मुझे लेके;
हर पल तोड़ा मैंने सबके ख्वाबो को, लोगों ने संजोया कई-कई सालों से मुझे लेके;
अपने लोगों के विश्वास पे ना खरा उतरा, दोष खुदमें नहीं उनमें ही ढूँढा ।
माता – पिता, भाई - बहन या हो जीवन संगिनी, कीसी की भी इच्छाओ को पूरा कर ना सका;
अपने में खुश रहा, कीसी भी तरीके से अपने स्वार्थ को दूसरों के द्वारा पूरा किया।
मन के सबकी ठेस लगती रही, कीसी न कीसी बात पे दिल दुखाया ।
असर ना होती थी किसी बात की, बेशर्मी की हद तोड़ दी थी मैंने,
उलटे – सुलटे कामों में खुद को उलझा कें परम के आगे पश्चाताप के आँसू बहुत बार बहाये।
मन में लगे कैसे वो मुझे ऊपर उठायेगा? जब खुद ही उठने को मैं तैयार नहीं ।
अपने अंतरमन को, अपने लोगों की हर बात अनसुनी कर, उन्हें झुठलाया।
इतनी खामियाँ है मुझमें, एक ढूंढो तो हजार मिलेंगी, मैंने झूठ बोला है सबसे ।
क्या में सच्चा हूँ परम मैंने तुझसे झूठ बोला है कभी ।


- डॉ.संतोष सिंह