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Hymn No. 2751 | Date: 23-Dec-2003
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छलना न चाहूँ हर बार की तरह, इस बार प्यार के रंग मैं रंग देना चाहूँ।
छलना न चाहूँ हर बार की तरह, इस बार प्यार के रंग मैं रंग देना चाहूँ।
घेरना न चाहूँ खुद को कर्मों के शिंकजे मैं, संजो लेना चाहूँ तुझे हमेशा के वास्ते अंतर मैं।
जुर्रत न करुँ तेरा कहा न करने को, जी जान लगा दूं तेरा चाहा करने मैं।
उठाये ऊंगली गर कोई तुझपे लेके मुझे, उससे पहले कायम् करुँ मिसाल प्यार की।
भरम मैं रहके भरमाना न चाहूँ, यथार्थ के धरातल पे प्यार के फूल खिलाऊँ।
उजड़े हुये जीवन को और न उजड़ने दूँ। वख्त रहते बहार लाऊँ इस जीवन मैं।
सारे कयासों का अंत कर देना चाहूँ, अथक प्रयासों से जन्म होने दूं नये कयासों को।
तेरा कहा करता रहूँ, इसी मैं अपने जिंदगी को परवान चढ़ाता जाऊँ।
तकदीर और तदबीर से परे बन जाऊँ मुरीद प्यार का, गाऊँ गीत एक प्यार का।
बिछाऊंगा पलकें अपलक तेरी राह देखते, जब तक ओत प्रात न हो जाये रोम मेरा।


- डॉ.संतोष सिंह