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Hymn No. 2753 | Date: 27-Dec-2003
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यों न दूर हमसे तुम जाओ, पास आते आते।
यों न दूर हमसे तुम जाओ, पास आते आते।
यों न चुप हो जाया करो, तुम कुछ कहते कहते ।
बानगी है मेरी किस्मत मैं कुछ, तो तुझसे मुलाकात की।
आवारगी थी जो भटका दर दर, मिला ढिकाना तेरे दर पे।
हसरतों को अर्पित किया तुझे, पर नाता न तोड़ा दुनिया से।
चुपचाप बेहाल होता गया, पर रोना न रोया किस्मत का।
न चाहा तुम नवाजो दुनिया से, पर चाहा तुझे अपने दिल से।
आस इतनी सी है रहे तेरा साथ, बनना पड़े चाहे किसीका भी दास।
पाँसा पलटने की राह देखूँ, तेरी आवाज को सुनने को तरसूँ।
लगी आग प्यार की अंतर मैं, जो सुलगते सुलगते भड़क जाये।


- डॉ.संतोष सिंह