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Hymn No. 2757 | Date: 16-Jan-2004
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चली, चली ये कैसी हवा चली, जिसे समझ न सके हम।
चली, चली ये कैसी हवा चली, जिसे समझ न सके हम।
प्रभु हम तो तेरे साथ थे पल पल, तो कैसे बहा मन इसमें।
समझ रहते समझ न आया, तेरी बेरूखी से हमको ख्याल आया।
सम्हाला हर बार तूने, तो कैसे कब हम लड़खड़ाते चले गये।
आज सम्भालना चाहा तो सम्भल न पाऊँ, तुझसे कैसे दूर हो गया हूँ।
चाहूँ वो हिम्मत, कमजोर न पडूँ किसके आगे, पहुंचूँ दर पे तेरे।
भर दे तू मुझमैं इतनी ताकत, कभी न रोऊँ अपनी विवशताओं को।
एक दिन न लू चैन, हर पल हर दिन तेरी ओर बढ़ता जाऊँ।
जल जाये तेरे परम् प्रेम में मेरी सारी इच्छायें, ढल जाऊँ अनुरूप तेरे।
दिल हो या मन या फिर इन्द्रियाँ कोई कर्म, तेरी और चलता चला जाऊँ।


- डॉ.संतोष सिंह