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Hymn No. 2763 | Date: 13-Mar-2004
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आशीर्वादों की न कमी है, न कमी है संगत की।
आशीर्वादों की न कमी है, न कमी है संगत की।
प्रभु फिर भी मैं क्यों रुका हूँ, जहां का तहाँ क्यों खड़ा हूँ।
साथ वाले चलते चले गये, गुरुवर ने भी चाहा बहुत कुछ।
दे न सका किसीको कुछ, रहम न किया हमने अपने ऊपर।
अनुभूति की थी न कमी, थोड़ा सा करने पे मिला बहुत कुछ।
फिर ये अर्कमण्यता कैसी है, जो हिलने न दे हमको थोड़ा भी।
जानने को जाना सब कुछ, रब ने भी की कृपा हर पल।
फिर भी माया के दल दल से न निकला, ओर फंसता चला गया।
हर दिन हर रात खायी कसमें लाखों, निभा न पाया एक भी।
प्रभु मुझसा भी क्या कोई हुआ होगा, जो लाखों लानत खाकर न सुधरा होगा।


- डॉ.संतोष सिंह