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Hymn No. 2770 | Date: 16-Mar-2004
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कैसे भूल गये तुम अपने आपको, हिंदू मुसलमां बनने से पहले जो थे तुम इंसान।
कैसे भूल गये तुम अपने आपको, हिंदू मुसलमां बनने से पहले जो थे तुम इंसान।
लकीर के फकीर क्यों बन गये हो, क्यों नही अपनाते प्रेम धर्म को।
जो निकले कृष्ण की बंसी से, जो गाये रहमान अपने नजमों मैं।
मुर्ति से परे पूजो प्रेम मुर्ति को, तोड़ दो दीवार सारे मतभेदों की।
चांद न है किसीका, न ही सूरज किसीका, रंग भी उपजे सिर्फ रोशनी से।
पीर फकीरों ने जो है बताया, उसी को तो है संतो ने सिखाया।
कहां से पनपे मतभेद तुम्हारे मन मैं, गहरे उतरके देखो एक ही के है सब बंदे।
कभी उसने न रोका, न ही उसने टोका, चाहे वहशियों को अपना तुमने रहनुमा बनाया।
डरो ना तुम किसी इंसा से, डरना सींखो तुम अपनी करतूतों से।
हिसाब होता है बराबर पर उसके, करनी की है तो भरना पड़ेगा कहीं भी तुझे।
- डॉ.संतोष सिंह
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रोके रुकने वाला नहीं, प्रभु जो तेरे पीछे पीछे मैं आने वाला हूँ।
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मुझे नहीं पता मैं क्यों गुम हो रहा हूँ, रह रहके होश क्यों खो रहा हूँ।
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