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Hymn No. 2771 | Date: 30-Mar-2004
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मुझे नहीं पता मैं क्यों गुम हो रहा हूँ, रह रहके होश क्यों खो रहा हूँ।
मुझे नहीं पता मैं क्यों गुम हो रहा हूँ, रह रहके होश क्यों खो रहा हूँ।
जो है संग हमारे वो क्यो दूर जा रहे है, गुमसुम से रहके क्यों दूर जा रहे है।
भविष्य से कुछ जानना न चाहा, न ही भूत से कुछ सीखने को तैयार था।
वर्तमान मैं रहते वर्तमान को चाहता रहा, न जाने मैं क्यों फिर भूत बनता गया।
मासूमियन जाने कब मुरखाई मैं बदल गयी, जो न जाने कितनी लंबी तनहाई दे गयी।
होश में रहते होश में न थे हम कभी, प्यार के दौर मैं और भी जो मदहोश हो गये।
दोष न है इसमें किसीका, दोषों से भरी जिंदगी मैं एक प्यार है मासूमियत से भरा।
उसपे भी तकदीर की जो मार पड़ी, मत पूछो जिंदा रहते जिंदगी का क्या हाल था।
सारे इंद्रजालों को तोड़ न सका, प्रभु के रहते दिल को जोड़ न सका।
फितूर न है ये कोई, ये तो दास्ताँ है पागल प्रेम की।
- डॉ.संतोष सिंह
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