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Hymn No. 2774 | Date: 31-Mar-2004
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न जाने तुम कहां चले जाते हो, पास रह रहके क्यों गुम हो जाते हो।
न जाने तुम कहां चले जाते हो, पास रह रहके क्यों गुम हो जाते हो।
मेरा प्यार एक खिलती कली है, जो जन्मा है एक रेगिस्तान् के बियाबां में।
जवां होने से पहले कही मुरझा न जाये, इस तपते मरुस्थल में तेरे दामन मैं सुकूँ है।
सुबह तो कब की हो चुकी है, काटे न कटे तपती दोपहर जो हर पल छीने श्वासों को।
कुम्हलाये से इस जीवन में प्यास बुझती है तो तेरे दामन से टपकी शबनमी बूंदो से।
दास्ताँ बड़ी अजीबो गरीब है प्यार की, यहाँ तो हर पल मौत खड़ी है।
राह एक नग्न तलवार सी है, जहां लौटना, ठहरना, चलना, मौत की छवि है।
समय रहते कर गुजर जाना है, नही तो जिंदगी का हर पल मौत से भी बदतर है।
- डॉ.संतोष सिंह
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