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Hymn No. 275 | Date: 18-Aug-1998
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प्रभु तू हमारा सबसे प्यारा, तुझसा नहीं कोई दुलारा,
प्रभु तू हमारा सबसे प्यारा, तुझसा नहीं कोई दुलारा,
जितना सरल है तू बाहर से, उतना गुड भीतर से ।
जिसने जो तूझे माना, वैसा ही स्वरूप तूने धारण किया।
भक्तों की हठ के आगे सदा झुका, तूने ना पकडी कोई हठ ।
जिसने तूझे सम्मान दिया, और जिन्होंने न माना तूझे ;
एक का कर्ता - धर्ता तू रहा, दूजे कर्मों से तेरे जग में रहा।
अतूल साम्राज्य का अधिनायक तू, फिर भी अस्तित्व की चाह ना तुझे;
जिसने जो कुछ भी तुझको प्रेम से अर्पित किया, उसे तूने ग्रहण किया ।
है जगत पिता तेरी महिमा कैसे करें वरदान हम,
तेरे साम्राज्य में करें कई - कई सूर्य - चंद्र निवास, हमारी क्या बिसात ।
मेरी हालत ऐसी हो गयीं, जैसे सूरज के सामने चिंगारी,
क्षुद्र से क्षुद्र हम, तूने स्थान दिया अपने इस महान जहाँ में ।
घट – घट का तू सृजन करता, उस घट घट में तू करे निवास,
उत्पन्न करता तू, लालन – पालन कर अपने में समा लेता सब कूछ ।
तेरा ये खेल अजीब है, आजादी काल से है जारी;
हम अज्ञानी क्या जाने, बस प्रेम में तेरे चरणों को पूजना चाहें।


- डॉ.संतोष सिंह