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Hymn No. 2796 | Date: 22-Jun-2004
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क्या न कर दूं तुम्हारे लिये, कर नही पाता कुछ तुम्हारे लिये।
क्या न कर दूं तुम्हारे लिये, कर नही पाता कुछ तुम्हारे लिये।
मन की सोच रह जाती है मन मैं, उतार नही पाता जो जीवन मैं।
चाहत है दिल मैं बहुत कुछ करने की, यथार्थ के आगे बिखर जाता हूं पल मैं।
माया के दल दल मैं जो गिरा, निकलने की कोशिश मैं ओर धसता जाऊँ।
तरसता रहा बचपन हो या जवानी बुढ़ापे मैं कौन सा दिन देखूंगा जान न पाऊँ।
दोष किसीका न है इसमें, इंसान के वेंष मैं जन्में दरिन्दे हम।
दुहाई देता रहा जिंदगी मैं, एक कदम चलना न आये मजबूती से।
कहने ओर करने मैं अंतर रहा सदा, दया के सहारे गूजारूं जो जिंदगी ।
बीते वख्त की तरह बीती जाये जिंदगी, मुस्करहाटों मैं छिपी है बेवफाई।
हालातों को दोष दिया जब, तोप न डाला अपनी करनी पे मूर्खता का।


- डॉ.संतोष सिंह