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Hymn No. 2797 | Date: 22-Jun-2004
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जीवन का कैसे करुँ विश्वास, पल पल में जो बदलता जाये।
जीवन का कैसे करुँ विश्वास, पल पल में जो बदलता जाये।
कभी धूप कभी छांव, न जाने ये किरण पल किस और ले जाये।
खेल खेले ये सबसे, किसी को न छोड़े चाहे हो अमीर या गरीब।
बांधे ना बंधे किसीके, जंजीर में, एक पल में तोड़े हर बंधनों को।
बिरला ही निकले कोई सीना ताने, रहकर सद्गुरू के साये तले।
वो जज्बा वो ताकत कहां से ले आऊँ, जो पार ले जाये मुझे।
अपनों के दिलों में खंजर चुभाया, क्यों बदनाम करुँ जिंदगी को।
ये तो है हमारे कर्मों की फसल, जो बोया वही तो काटना है पड़े।
समय रहते जो चेते न अब हम, तो कागद काला करके क्या होये।
उठाया उसने लाखों बार, उठना न चाहे जो हम, तो रो रोके क्या फायदा।


- डॉ.संतोष सिंह