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Hymn No. 2798 | Date: 22-Jun-2004
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हंसो हंसो ओ दुनिया वालो तुम मुझपे, मैं काबिल हूँ तुम्हारी हंसी के।
हंसो हंसो ओ दुनिया वालो तुम मुझपे, मैं काबिल हूँ तुम्हारी हंसी के।
मसखरा मुझसा ना कोई दुनिया मैं, जन्मजात हूँ ठग जो ठगे अपनों को।
तुमने किया अनजाने मैं, मैंने तो जानते समझते किया, करके बाज न आया करने से।
बात बात पर दगा करता रहा, रोया बहुत देखके शर्मा जाये मगर भी।
विश्वास की बातें करके, अपनों को मजबूर किया विष का कटोरा बार बार पीने को।
दागी मुझसा न कोई संसार में, जिसने सर्वस्व दिया उसी को डसा जहर से अपने।
गैरत इतनी भी न थी जो ललकार सकूँ अपने को, गिरता गया गिरता गया।
समय रहते जो न पकड़ सका तेरे हाथों को, तो कैसे काम आये कोई जिंदगी में।
- डॉ.संतोष सिंह
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