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Hymn No. 2799 | Date: 23-Jun-2004
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मन के खेल मैं फंसते चले गये, फंसते चले गये,
मन के खेल मैं फंसते चले गये, फंसते चले गये,
बनना था रब का, बन न सके हम किसीके।
ये नियति की मार थी, या कर्मों का खेल,
तेरे पास रहते जो तुझसे जुदा हो गये हम।
सौंपा था खुद को, पर मालिकी कर करके गुलाम जो बन गये,
जो न चाहा था हमने, उस हाल मैं हम पहुँच गये।
खेल चलता रहेगा माया का, साया बदलता रहेगा जिंदगी का,
मुझ जैसे न जाने कितने पशुवत जिंदगी जीते रहेगे।
इस जीवन में कोई बात न है, जो तुझसे छिपी हो,
निरे आँसुओं का कोई मोल नहीं है, मोल है तो बस दिल का।
सपनो को देखना शायद वश मैं है हमारे,
पर अंजाम तक पहूँचना होता है तेरे सहारे।
कहर बन चुका है समय, करनियों के चलते,
छटपटा छटपटा के रह जाता हूँ तेरे यादों में खोंके।
जो हाल होगा उसका कोई गम नही,
गम तो है बस एक बात का, जो तेरे अब हम नही।


- डॉ.संतोष सिंह