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Hymn No. 2813 | Date: 13-Jul-2004
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मूक कर ठाला बोलते सुनते अपने पिता को,
मूक कर ठाला बोलते सुनते अपने पिता को,
जो कहा करते थे हमारी, जो सूना करते थे हमको।
मूक कर डाला उस पिता को जो जहां मैं साथ रहते थे,
बातो बातो में बितती थी जिंदगी हंसी के ठहाको के संग।
डूबे रहते थे हम इतना, होश रहता नही था जिंदगी जीने का।
वही कोहराम था जिंदगी का, फिर भी मस्ती के सिवाय कुछ ओर न था।
देखके लोगों को हैरान होते थे हम, जिंदगी क्यो उदास है इतनी,
क्यों करते है लोग ऐसा वैसा, जब परम् पास है इतने।
जाना दूर जाने के बाद उसके, गम, लोभ, चिंता, क्रोध हैं क्यों,
काम के मद में बहके, बनता है इंसान हैवान क्यों जहाँ में।
लौटा दे तू मेरे सुनहरे दिन एक बार मुझको
मुझे नही खोना है दुनिया में, मेरी जिंदगी का दूसरा नाम है तू जो है।


- डॉ.संतोष सिंह