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Hymn No. 2818 | Date: 28-Jul-2004
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ये प्रभु की अनुपम लीला है, यह कोई न जाने न।
ये प्रभु की अनुपम लीला है, यह कोई न जाने न।
आये हर बार नये नये स्वरूपों में, दोहराये न कभी किसी कहानी को।
पाठ पढ़ाये हर बार नया नया, हाथ पकड़के उठाये जन्मों पुरानी नींद।
हम भी इतने ज्यादा डूबे रहते हैं, तोड़ना नहीं चाहते नींद जन्म जन्म की।
कहते है खुद को दास उसका, पर कहा करना रास न आये नहीं कभी।


- डॉ.संतोष सिंह