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Hymn No. 278 | Date: 14-Aug-1998
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श्रध्दा के आँसूओं से सींचा है, प्रेम के अंकुर को,
श्रध्दा के आँसूओं से सींचा है, प्रेम के अंकुर को,
विश्वास का खाद दिया, भावनाओं का प्रकाश मिला उसे हर पल ।
परम स्नेही सद्गुरू के चरणों में पल – बढ़के बड़ा हुआ;
उसमें प्यार नाम का पुष्प लगा, स्नेह की सुगंध बिखरी चहूँ ओर ।
अपने गुणो के भार से शीश झुका रहता था परम् सद्गुरू की ओर,
मन मचले उसका हवा के थपेडों संग, तन से अलग होने के लिये।
बहुत झूम चुका था दुनियादारी की कंटीली शाखाओं पे;
अब फ़ना हो जाना चाहता था, अपने परम सद्गुरू के चरणों में ।


- डॉ.संतोष सिंह