VIEW HYMN

Hymn No. 2821 | Date: 05-Aug-2004
Text Size
दिले दास्ताँ सुनाऊँ किसे, समझ नहीं पाऊँ कौन है अपना कौंन पराया।
दिले दास्ताँ सुनाऊँ किसे, समझ नहीं पाऊँ कौन है अपना कौंन पराया।
ढूढ़ती है निगाहें जमाने में, कोई तो मिले जो जाना पहचाना सा लगे।
कद्र न की मिले हुये की, जब जाना तो वख्त निकल चुका था हाथों से।
उफ् भी न कर सके, डबडबाई आँखो से ओझल होते हुये देखते रहे।
दोष न था दुनिया का, संजोना न आया जो हमको बचकानी भरी जिंदगी मैं।
टूटे दिल के तारों को न छेड़ो, बज उठेगी धुन विव्हल हो जायेगा मन तेरा।
तंग हूँ मैं अपने कर्मों से, न कि दर्द का हूँ मारा, मरे हुये को अब कौन मारे।
सीख ले लो ओ... दुनिया वालो, तकदीर ओर कर्मों का मारा बच सकता है, जो समय रहते सचेत होता है।


- डॉ.संतोष सिंह