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Hymn No. 2828 | Date: 19-Aug-2004
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आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा।
आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा।
मत ले इतना इम्तहाँ तेरे हमदम होने का, आ भी जा।
लेना है तो ले ले मेरा चैन, तुझे पुकारता रहूँ बेसब्रा होके।
धिक्कार है इस जीवन को, जो अब तक कायम है तेरे मेरे बीच मैं।
खोई थी कसमें न जाने कितनी, निभायी न एक हमने।
पागल हुआ जा रहा हूँ, फिर भी बाज न आऊँ अपनी हरकतों से।
सनम कसम से, क्या न कर दूं समझ न पाऊँ।
जो कहा था तूने उसे, आज तक करता आया, तो कैसे करूँ मैं।
मेरे आंसू सच्चे नहीं, इसलिये तू लेता है इम्तहान बार बार।
मिटा न सकी तेरे मेरे बीच की दूरी को, जो अब तक कायम है।


- डॉ.संतोष सिंह