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Hymn No. 2831 | Date: 24-Aug-2004
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अश्रुओं से अपने पखारू तेरे चरण कमल को।
अश्रुओं से अपने पखारू तेरे चरण कमल को।
भग्न हृद्य में मेरे तू संचार करे परम् प्रेम का।
गाता हूँ नवगीत अवरूद्ध कंठ से, बेमानी स्वरों में।
बेताब होता जाये दिल रह रहके, तेरे पास आने को।
न हो जो तू करीब मेरे, अहसास दिल की धड़कनें तेरी।
मसरूफ रहता हूँ दुनिया में, तेरे प्यार को मस्तक रखे पल पल।
अंत हो जाता है मन का, न रहता है कोई ओर ख्याल।
हवा के मांनिद तिरता हूँ, तेरे साथ पल पल विचरता हूँ।
आनंद में रोम रोम थिरके, मगन होके यहाँ वहाँ झूमता हूँ।
तुझे प्यार के सिवाय कुछ ओर न कहूँ, हर वख्त तेरा ही रहूँ।
- डॉ.संतोष सिंह
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प्यार का बाना बूना था तेरे लिये, अफसाना बनके रह गये।
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मैं चला था बिना सोचे समझे, कभी ये न जाना होगी मुलाकात तुझसे।
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