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Hymn No. 2841 | Date: 08-Oct-2004
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शब्दों में ढुँढ़ता हूँ प्रेम भरे गीतों को, साधना चाहूँ जो सूरों में उनको।
शब्दों में ढुँढ़ता हूँ प्रेम भरे गीतों को, साधना चाहूँ जो सूरों में उनको।
निशब्दता का अहसास होता है मन के भीतर, तभी मन के किसी कोने में कुछ गूंजता है।
अधखुली आँखो से शून्य मैं जो ताकता हूँ, एक धुंधलाती सी, छवि नजर जो तेरी आये।
ध्यान से जब उसे देखने की कोशिश करता हूँ, तो एक आभा बनके गुम हो जाये।
ये क्या होता है, क्यों होता है, कैसे होता है से परे जब कुछ सोचता हूँ।
तो फिर से उभरे, न जाने क्यों मेरे संग आँख मिचौली का खेल क्यों खेला।
बड़ी अजीब बात है एक के बाद दूजा, दूजे के बाद तीजा, तीजे के बाद चौथा।
न जाने इतने रूप तू कैसे बदलता है, मेरे दिल के भेद को तू कैसे पहचानता है।
तब अचानक जब मुस्कराते आँखे खोलूं, तब शून्य मैं हंसते हुये तुझे पाता हूँ।
पलको के झपकते तू फिर से गायब हो जाता है, पास आ आके तू दूर क्यों हो जाता है।


- डॉ.संतोष सिंह