Hymn No. 281 | Date: 15-Aug-1998
प्रपंच है, प्रपंच है, ये दूनियादारी प्रपंच है, प्रपंच में रहके ही सबको पार पाना है ।
प्रपंच है, प्रपंच है, ये दूनियादारी प्रपंच है, प्रपंच में रहके ही सबको पार पाना है । प्रपंच में रहके हम सबको तेरा नाम लेना है, प्रपंच के बिन जीवन नहीं । नहीं भागना है इस प्रपंच से, प्रपंच के संग जीना पड़ेगा हर दम । फँसना नहीं इसमें, धसना नहीं, इसके संग रहते हुये सदा तुझमे खोना है । जैसे दहीं में मक्खन होता है, पानी डालकें मथनें से हो जाता है अलग; वैसे ही हर पल सद्गुरू का ध्यान करते हुये, प्रपंच में रहते हुये प्रपंच से अलग है रजा प्रपंच के दायित्वों को निभाते हुये नाम उसका तू लेना, सौंप देना सब कूछ उसको । प्रपंच से कोई बच ना सका है, ये आगे है, इसमें तप के जो निकला वो है खरा । प्रपंच सदा से है, सदा ही रहेगे, ना छोड़ना है, ना ही मरना इसके संग जीते रहना है । दाग लगता है तो लगने दे तन पे, दिल पे दाग ना लगने देना प्रपंचो का । प्रभु आये धरा पे तो प्रपंचो के संग निभाते हुये जीने की कला सीखा गये । हार मत मानना तू इससे, गले का हार बनाके पहन ले, जीना तू सीख जा इसके संग । भागने वालों के पीछे भागे ये, जो इसके संग जीये, उनके बस में सदा रहे । प्रपंच के बीच में रहके प्रभु को पाना है, उसके दर पे जाना है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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