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Hymn No. 283 | Date: 16-Aug-1998
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तू ही मेरी आत्मा, तू ही मेरा परमात्मा;
तू ही मेरी आत्मा, तू ही मेरा परमात्मा;
तूझ बिन् अधूरा ये तन क्षणभर में क्षणभंगुर हो जायेगा
चेतन तू ही, अचेतन है हम सब;
तन – मन में आके भूल जाते है तूझे, दूर हो जाते है तुझसे ।
तू ही प्राण है, जब तेरा प्रयाण हो जाता है
पल भर गँवाये बिन अपने ही लोग इस तन को फूँक आते ।
तू ही नित्य, सर्वदा, अकाल, अजन्मा ;
तन में बंधते ही हम फँसते है जनम् – मरण के चक्कर में ।
हम तूझे खोजने के लिये भटकते है जगत में;
तू है जो सर्वदा रहता है संग – संग हमारे ।
तुझसे ना कुछ छुपा है मन की बात हो,
या हमारे हर कर्मों का लेखा – जोखा तू है रखता ।
कुछ भी ऐसा नहीं जो हो तेरी पहुँच से दूर
तुझसे प्रथक कूछ भी नहीं, हर कण – तन का स्वामी इक तू।


- डॉ.संतोष सिंह