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Hymn No. 2884 | Date: 05-Nov-2004
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किसी की समझ को लेके जिया तो क्या जिया, जो समझ न पाऊं प्रभु तेरे अंदाज को।
किसी की समझ को लेके जिया तो क्या जिया, जो समझ न पाऊं प्रभु तेरे अंदाज को।
हर एक की अपनी अपनी डगर है, कोई दोहरा नहीं सकता किसी के अंदाज को
बात कहने और करने का ढंग सबका अलग अलग है, करते तो बस अपने आपका हैं।
समझ से परे समझ है, नासमझी में डूबे हम इंसानों की फितरत के अनुसार अपनी समझ है।
जो होना है वो होके रहेगा, जो होआ है वो न बदलेगा, प्रभु की कृपा से सब कुछ घटेगा।
सुनिश्चित न है इस दुनिया में, जो आज यहाँ हैं वो कल न जाने कहाँ है जाने न कोई।
बस कहने की बात है कोई न साथ है, जमाने का जो अंदाज उसके विपरीत जीवन का राज है।
परेशानियों से परे न इंसान है फिर भी हर इंसान के अंदर ईश का ही साम्राज्य है।
जो चाहा वो होवे ना, जो होवे वो तो किस्मत की बात है, किस्मत से परे सद्गुरू का हाथ है।
माटी मैं जन्मे माटी मैं मिलना है, ये तन तो बस प्रभु को पाने का इक खिलौना है।
- डॉ.संतोष सिंह
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