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Hymn No. 2887 | Date: 10-Nov-2004
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गुनगुनाता जाऊँ तेरे प्रेम भरे गीतों को, याद करते बिताये गये पलों को।
गुनगुनाता जाऊँ तेरे प्रेम भरे गीतों को, याद करते बिताये गये पलों को।
मायूस हो जाता हूँ जिंदगी के अनचाहे दौर से, सकून पाता हूँ तेरे पास आके।
बीताए न बीते ध्यान जो दूं न जाने कितना वख्त गुजरा पाऊं, और मैं तड़पता जाउँ।
अनजान सी हरकत न जाने क्यों धैर्य से किये कर्मों पे पानी फेरती है।
ये क्यां हो रहा है, चाहतो से दूर अनचाहों के बीच जो तुझे ढूंढ़ता हूँ।
छूट जाता हूँ अपनों से भरी दुनिया में, जब किसी को अपना नहीं पाता हूँ।
हैरानी होती है अपनी उदासी पे, उदासीको खत्म करने के पीछे खुद खत्म हो जाता हूँ।
- डॉ.संतोष सिंह
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