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Hymn No. 2888 | Date: 10-Nov-2004
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क्या बोलूं, क्या न बोलूं, जो है वो ठीक है,
क्या बोलूं, क्या न बोलूं, जो है वो ठीक है,


समझ में न आये, या समझा ना पाऊँ सब ठीक है।
चलते चलते जो राह भटकूं हाथ पकड़के लाये तू,

प्रेम से हर बात को समझायें ऐसा एक तू ही था।
जमाने के संग जमाना बनके रहूँ तो क्या रहे,

तेरे पास आके तेरा न हुआ तो क्या मतलब है जिंदगी का।
करना चाहता हूँ अच्छा, कर जाता हूँ कुछ और,

सहारे की तलाश में, कर नहीं पाता हूँ कुछ चाहा हुआ तेरे।
दुआ के सहारे हूँ नहीं तो किनारे रहके मंझधार मैं हूँ,

अपना हाल है कुछ ऐसा, अपना होके अपना न है कोई।
दोष देता हूँ न किसीको, दोष से भरा जो हूँ मैं,

दिल तो दुआँ दे सदा गैरों को, अपनों के वास्ते जिंदगी है।
भारी हो गया हूँ मैं इतना, कूड़े का ढेर भी शरमाये,

गले लगाने से अपने भी अब तो नजर चुराये।


- डॉ.संतोष सिंह