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Hymn No. 285 | Date: 16-Aug-1998
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मैं हर इक को क्यों करूँ प्रणाम, वो एक ही तो है हर एक में ।
मैं हर इक को क्यों करूँ प्रणाम, वो एक ही तो है हर एक में ।
उस इक को – हर – हर मे मैं करूं प्रणाम, बहु तेरे नाम है उस बहुरूपीये के ।
हर रूप का एक मोहक अंदाज है, उस अंदाजपे फिदा है कोई ना कोई दीवाना।
वहीं तो श्याम है मीरा का, राम है तूलसी का, उसका अपना अलग – अलग है अंदाज ।
कभी वो निराकार है नानक का, अद्वैत अवस्था है शंकराचार्य का ना रहके, रहता है वो संग सदा।
कही ज्ञान रूप में, कहीं प्रेम रूप में, जिसनें जैसा उसको माना उसने वैसा ही जाना।
अपनी – अपनी हस्ती को मिटाकें सब रहते है मस्ती में उसके संग, अजीब अलग रहता है ।
हर इक् प्रेमियों का अपना – अपना अंदाज है, पर सबके सबका परम विश्वास है उसपे ।
रहते – रहते उसके संग, जुदा रहके भी रंग जाते है उसके रंग में, हर भेद मिट जाता है।
उस काका के बारे में क्याँ लिखूँ, जितना लिखूँ उतना ही है, कम, दम नहीं मेरी कलम में।
- डॉ.संतोष सिंह
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