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Hymn No. 2892 | Date: 16-Nov-2004
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बड़े बड़े रत्नों के बीच न रहती है कभी कोई पूछ माटी के ढेलों की।
बड़े बड़े रत्नों के बीच न रहती है कभी कोई पूछ माटी के ढेलों की।
एक बार को कोयला भी काम आ जाये, न काम कोई माटी का।
खुदा तेरे वास्ते तो सर्वोत्तम ही उत्तम है, इस अधम की कहाँ कोई बिसात।
कभी भार का मोल नहीं मेरा जमाने में, ना ही करता हूँ कोई विशेष काम।
राज की बात ये है फिर भी तेरा प्यार पाता हूँ, तेरे ख्वाबों को संजोता हूँ।
अपने किये का शिकार हूँ, फिर भी अपने हालातो को तेरे प्यार का नाम देते है।
सरमायेदार बनता हूँ जमाने भर का, औकात् नहीं रखता रत्ती भर की।
काटो तो खून ना निकले, दिल मैं भी चैन नहीं रहता।
तड़पूं जैसे जल बिन मीन् सुकून पाता हूँ जो तेरे पास आता हूँ।
ये आने जाने का खेल खतम कर दे, बस रख ले तेरे पास तेरा बनके।


- डॉ.संतोष सिंह