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Hymn No. 2894 | Date: 20-Nov-2004
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कभी कभी अपने से सवाल करता हूँ,
कभी कभी अपने से सवाल करता हूँ,
एक के बाद न जाने तिने सवाल करता हूँ।
क्या झुंठे है मेरे सवाल, या मनके हैं ख्याली पुलाव,
समझ नहीं पाता हूँ, तब डूब जाता हूँ वेदनाओं में।
ये कैसी व्यथा है, जो जुड़ी रहती है सबसे,
क्षणिक सुखों के वास्ते, अंतहीन दुःखो का है सैलाब।
फिर भी उसी के वास्ते जिना और मरना चाहते हैं,
प्रभु जितना तू अजीब, उससे भी ज्यादा तेरी दुनिया।
अनेकों है कृपा तेरी उसमें से एक जो लेता हूँ श्वास,
खबर नहीं किसी को किस पल क्या घट जाये।
पल भर मैं जो जिंदगी का स्वरूप बदल जाये,
रोके रूकें नहीं, जो खेल जारी रखे तू सदा से।
हम जैसे ना जिंदगी मैं डूबें ना ही तुझमें।
तड़पते है वैसे जैसे जल बिन् मीन।


- डॉ.संतोष सिंह