VIEW HYMN

Hymn No. 2907 | Date: 10-Dec-2004
Text Size
नहीं नहीं अब ओर सहा नहीं जाता, तेरे रहते अब ओर रहा नहीं जाता।
नहीं नहीं अब ओर सहा नहीं जाता, तेरे रहते अब ओर रहा नहीं जाता।
खुशियाँ लुट चुकी है जिंदगी में, गमों के दौर के बाद जो बस गम है जिंदगी मैं।
कर्म तो मेरे है, फिर भी ऊबता जा रहा हूँ जिंदगी के नागवार दौर से।
कुछ ओर कुछ ओर करने के नाम पे धोखा दे रहा हूँ, जहाँ का तहाँ।
चाहा था क्या ओर क्या से क्या होते गया ओर खुद को में खुद से लुटते गया।
दोष न था किसी का, बंदगी के नाम पे उल्फत का जाम पीते गया।
समय रहते जो चेत न पाया, तो कैसे मिलेगा प्रियतम् का साथ जिंदगी मैं।
एक बार किया हो तो ठीक है, बार बार दोहराया उन कर्मों को जो न करना चाहे।
अंबार लगाया बहानों का जो ऐसा था तो वैसा हो गया, ये होता तो वो करता।
कहां से ये दोष आया था, तेरे साथ होकर भी जो न छूट पाया में।


- डॉ.संतोष सिंह