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Hymn No. 2915 | Date: 30-Dec-2004
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रत रहना चाहता हूँ अनवरत तेरे प्रेम में,
रत रहना चाहता हूँ अनवरत तेरे प्रेम में,

देह रहते विदेही बनके मस्त रहूँ तेरे ज्ञान में।
जन्म लेके अजन्मा बना रहूँ तेरे संसार में,

आसक्तियों के बीच निवृत्त रहूँ तेरे विचारों में।
नम्र रहते परम् शक्तिशाली बनूँ तेरी कृपा से,

सोते हुये सतत जाग्रत रहूँ परम तत्व के अहसास से।
बालको सा सहज सरल रहते हुये तेरी कथा की मिसाल बनूं,

बनती बिगड़ती से परे अथक प्रयासों का जो सार बनूँ।
सारी इच्छाओं को सौंपते तेरी महाइच्छा का गीत लिखूं,

खेल खेलता फिरूँ संसार का, पर पल पल तोड़ता फिरूँ माया का।
ग्रहण सब कुछ करुँ तेरे नाम पे, ओर त्याग की मिसाल बनू,

जलवा तेरा मेरे अंतर्मन ओर रोम रोम पे चले, तेरा अपना भक्त बनके रहूँ तेरे संग।


- डॉ.संतोष सिंह