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Hymn No. 2917 | Date: 16-Jan-2005
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जो बात दिल मैं है जुबां पे आती क्यों न है,
जो बात दिल मैं है जुबां पे आती क्यों न है,
तेरी ओर बढ़ते कदम रुक जाते क्यों है।
मजबूर मैं हूँ कि मजबूर तू है कि तोड़े टूटे न मजबूरी।
खत्म होते होते फासले अचानक बढ़ जाते क्यों है।
तकदीर का खेल, कर्मों का मेल घेरे क्यों सब ओर से,
तेरे इतने पास रहते रहते, तुझसे इतना दूर क्यों हूँ।
सब जानते समझते न कर पाने का रोड़ा क्यों है।
खत्म होती किताब पूरी क्यों न होने पाये।
जरूरत तो जरूरी है अंतर की वो अधूरी क्यों है,
प्यार का सबब जानते हुये प्यार की समझ क्यों न है।
अब ओर कितना तड़पूंगा कि हर पल तू तड़पायेगा,
जन्नत जाके भी मेरी चाहत क्यों न पूरी हो पाये।


- डॉ.संतोष सिंह