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Hymn No. 2930 | Date: 05-Feb-2005
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हँसता हूँ, हँसता हूँ, ओ मालिक पल पल मैं हंसता हूँ...
हँसता हूँ, हँसता हूँ, ओ मालिक पल पल मैं हंसता हूँ...
अपनी कमनसीबी पे कह लो या बेवकूफी पे मालिक पल पल मैं हंसता हूँ...
हंसे कोई और उससे पहले मैं हंसता हूँ अपने आप पे पल पल...
रोते हुये हंसता हूँ, तुझे याद कर करके अपने किये पे मालिक...
दाल गलानी चाही दाल गल ना सकी, जो बीरवल की खिचडी थी जिंदगी मेरी मालिक...
हंसते है लोग मुझपे, मैं खुद भी खुद पे हंसता हूँ मालिक पल पल...
दोष कहा है इसमें किसी का, दोष जो था मुझमें मालिक पल...
रोना रोया हर बार हालातों का, करना जो न आया कहा तेरा मालिक...
कुछ भी न है ऐसा फिर भी दिया तूने, संजोना न आया मालिक...
हँसने में बिखर जाना चाहता हूँ, एक हंसी बनके तेरा होके रह जाना चाहता हूँ ओ...
- डॉ.संतोष सिंह
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