VIEW HYMN

Hymn No. 2935 | Date: 04-Mar-2005
Text Size
मैंने नींद को बढ़ते हुये देखा है, ज्वर को मैंने लीलते हुये देखा है।
मैंने नींद को बढ़ते हुये देखा है, ज्वर को मैंने लीलते हुये देखा है।
काल के वश में होते हुये को जाना है, प्रभु तेरी लीला को घटते हुये देखा है।
कब क्या हो जाये कोई न बता पाये तेरे सिवाय कोई न पता पाये।
हसी के झरनों के बीच दुःखों का सैलाब उठते हुये देखता है।
एक ही जन्म में एक इंसा को न जाने कितने किरदार को निभाते हुये देखा है।
फिर भी समझके समझ न पाये कोई, हाय रे कितनी घोर है माया तेरी।
बिरला ही कोई जाने, उसके बताये को कोई बिरला ही समझ पाये।
रफ्ता रफ्ता दुनिया को बदलते हुये देखा, खुद को भी बदला बदला पाऊँ।
तेरी जो मेहरबानी है तो तेरी कहानी को टुकड़ो में गाता जाऊँ।
पलभर मैं फूटने वाला बुलबुला, क्या राज उठायेगा महासागर की गाथा से।


- डॉ.संतोष सिंह