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Hymn No. 2937 | Date: 05-Mar-2005
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मेरी कोई औंकात नहीं, जो तेरे पास चाहूँ तो आऊँ, मेरी...
मेरी कोई औंकात नहीं, जो तेरे पास चाहूँ तो आऊँ, मेरी...
जो तू चाहे तो मैं, तेरे पास पहुँचू पलक झपकते।
किस्मत का खेल है, जो कर्मों की बदौलत तुझसे दूर हूं,
बदले तू तो बदले, तेरे बदले न बदले तो कौन बदले।
मुसाफिर हम एक राह के, फिर भी मजिल के रहते दूर हूँ।
दोष इसमें कहां किसी का, जो चाहत को बदल न पाया करने मैं।
हसरत कब पूरी होगी दिल की, जिसे अब बदल न सके मौत ओर जिंदगी।
तार तार होता जाये जीवन लम्हों मैं, फिर भी न टूटे ख्वाब मेरे।
हंसता हूँ अपने आप पे, जो लोगो को सोते देखे ओर मैं देंखूँ जागते नयनों से।
हद हो गयी जो तेरी मेहरबानियों मैं पल पल बदले जिंदगी।


- डॉ.संतोष सिंह