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Hymn No. 2941 | Date: 17-Mar-2005
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दिल की बात आये न कैसे लबों पे,
दिल की बात आये न कैसे लबों पे,
जब रुक रुक के श्वास चलती हो तो मन कैसे लगे।
देखते देखते बीतता जाये, ख्वाबों के मानिंद जिंदगी,
जितना पकड़ने जाऊँ निकल जाये, जैसे हाथों से पवन।
तसव्वुर न पल भर को पाऊं, भटकूं मृग बनके बियाबान मैं,
आशाओं निराशाओं मैं गोता लगाऊं चाहके चाहत को जता न पाऊँ।
हंसी का फव्वारा फूटे हर पल, उतना ही गम मैं डूबा हूँ,
मयस्सर नहीं जो अब तेरा प्यार, तरसता हूँ दीदार को तेरे,
कींमत न होगी कोई मेरी, न होगा मोल आंसुओं का मेरे,
कहां से लाऊँ मैं, क्या, जो हासिल करा दे प्यार को तेरे।


- डॉ.संतोष सिंह