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Hymn No. 2944 | Date: 29-Mar-2005
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ऐतबार न है तुम्हारे कुछ कहने से, जो ऐतबार न है खुद पे।
ऐतबार न है तुम्हारे कुछ कहने से, जो ऐतबार न है खुद पे।
मोहब्बत का दम जो भरता हूँ, तो क्यों नहीं जानेमन मैं बदलता हूँ।
न बदलूं खुद के वास्ते, तो ये खुदा बदल जाऊँ कैसे भी तेरे वास्ते।
ये कैंसा लेखा जोखा है, जो मिटाये ना मिटे जिंदा जलाये पल पल हमको।
तुम्हारी राह में बिछने को तैयार होंगे मुझ जैसे न जाने कितने।
मन के फेरों को तोड़के, कैसे हो मुराद पूरी दिल की मेरे।
हारते हारते हारने की आदत ऐसी पड़ी, जीत का भी ख्वाब देखने न पाऊँ।
जीवन की इस आपा धापी मैं व मेरे वास्ते कुछ है तो वो तू है।
पड़ती नही है निगाह अब किसी पे, चाहे तेरा रहना हो या न रहना।
सकून न है मन मैं जो तेरे जाते विदा हो गयी जिंदगी से मेरी।


- डॉ.संतोष सिंह