Hymn No. 2946 | Date: 30-Mar-2005
धड़कता दिल बुनता है नये नये ख्वाब, तेरे प्यार के।
धड़कता दिल बुनता है नये नये ख्वाब, तेरे प्यार के। यथार्थ की तलवार करे कितना भी वार, पर देखने से ना चूकें तेरे ख्वाब। रहमो करम पे तेरे जिंदा हूँ भले, पर कही न कहीं तेरी चाहत है। मिटने को मिटे सब कुछ, पर तेरी यादों का सुनहरा दौर है जारी। लड़ाई पहुँच गयी है आर पार के दौर मैं, निकलूँगा तेरे प्यार के सोच मैं। होने को होना है बहुत कुछ, पर तेरे होने से ज्यादा कुछ भी नही। पल पल संवरके अब चलता हूँ, तेरी राहों से जो न हटती है। मिटते कदमों के निशां को जेहन में संजोता हूँ, जो अहसास कराये तेरी। तलवार की धार से कम नहीं जिंदगी, सकून की छांव है तेरा प्रेम। हममें दम न था फिर भी जो मिला साथ तेरा, तो न जाने दूंगा मौका आज।
कर्म योगी अपने आप मैं एक संगठन है, ओर उसके वास्ते कुछ भी असंभव सचमुच नही है, वह अजेय है। वह अपनी दृढता से या योगबल से ब्रम्हांण्ड के किसी भी कोने में कुछ भी कर सकता है।
सद्गुरू की इच्छा के लिये, जीना सबसे बड़ा योग है, ओर जहां योग है, वहीं सच्ची पूजा है, वही सच्ची भक्ति है, अगर उसमें नम्रता का सद्गुण है तो वो अपने आप मैं बेमिसाल है। सद्गुरू के लिये किया गया कोई भी कार्य सद्गुरू की सहमति से कर्म से परे होता है, अगर उसमें अपना अहम न हो। प्रभु सब बर्दाश्त करते हैं पर योग्य भक्त के अहम् को पल भर भी बर्दाश्त नहीं करते। सभी राह प्रभु की ओर जाते है, अगर अपने अहम् या क्षुद्रता का त्याग कर दिया जाये। व्यवहार दुनिया का हर क्षेत्र प्रभु से जुड़ हुआ है, बस खुद के स्वार्थ को त्याग करके ईश्वर अर्पित कर दिया जाये तो धीमी गति से चलने वाली गाड़ी की रफ्तार यकायक तेज हो जायेगी तथा उसमें शक्ति भी आ जायेगी तथा राह की कई कठिनाइयां क्रमशः निशेष होती जायेगी। पर प्रयत्न लगातार धैर्य पूर्वक हो।
मन के द्वारा किये गये कर्मों का परावर्तन हाथ पैर या अन्य कर्मइन्द्रियों पर होता है। कर्म इन्द्रियों के द्वारा किये हुये कर्म का परावर्तन मन पे बहुत कम होता है।
- डॉ.संतोष सिंह
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