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Hymn No. 2948 | Date: 01-Apr-2005
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कही कुछ खोया खोया सा लगता है, तेरे पास पहुँचके भी दूर दूर होता है।
कही कुछ खोया खोया सा लगता है, तेरे पास पहुँचके भी दूर दूर होता है।
अपने भी पराये पराये से लगते है, ओर दूजों मे भी अपनापन झलकता है।
दुनिया सराय सी तब नजर आती है, कायम के घर की याद बहुत आती है।
जीवन एक सपना सा लगता है, बंद आंखो के पीछे तब सच झलकता है।
खोने पाने के बीच दुनिया सिमटती है, तब सच्चें प्यार का अहसास नित्य होता है।
हर पल को कर्म मैं बदलते देखता हूँ, तो कोई कर्मों का व्यापार करते करते कर्मों से परे होता है।
प्रभु माया का खेल सदियों से खेलता है, खुद ही भोगके भोग से परे रहता है।
दुनिया को नाच नचाता है हर पल, तब जो किसी बिरले के संग नाचने धरा पे उतरता है।
सोचो तो सोच से परे न जाने कितने खेल खेलता है, एक रहते हमैं हजारों पात्रों का स्वांग करते हैं नये नये जन्मों में।
- डॉ.संतोष सिंह
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कब कौन सा सपना सच हो जाये, प्रभु तेरे सिवाय कोई जाने न।
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प्यार है ढाई अक्षऱ का शब्द, क्या है कोई बिरला ही जाने।
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