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Hymn No. 291 | Date: 19-Aug-1998
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खेल जारी है सदियों से, कई बार परदा गिरा और उठा;
खेल जारी है सदियों से, कई बार परदा गिरा और उठा;
यहाँ दर्शक एक है, पात्र अनेक, करम ही डाइरेक्टर है ।
स्टेज तो है ये दुनिया, हर कोई जुटा है अपने अपने अभिनय में;
खुद ही समझना है, खुद को समझाना, कौन सा रोल निभाना है ।
सारे के सारे रोल पुराने है निभा चुके हम कई कई बार,
हर कोई व्यस्त है अपने – अपने अभिनय में, उस पात्र को जीने में,
खूद को भूलाके, उस पात्र को जीके, जीवंत कर दिखाने में ।
दर्शक तो मौन है, ना वो कयास लगाता, ना ही आस रखता
कीसी के लिये न ताली है न गाली, वो तो खाली का खाली बैठा है मुस्कुराते हुये ।
जिनको उसकी याद आती है, उनको पास बुलाता है प्रेम से बिठाता है पास अपने ;
खुदकी उसे याद दिलाके उसे वो समझाता है ।
मुक्त हो जाते है वो अपने कीरदार से, सब कुछ देख के अनदेखा करते है,
खाली बैठे बैठे दर्शक के चरणों में झूमा करते है ।


- डॉ.संतोष सिंह