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Hymn No. 2965 | Date: 07-May-2005
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कितने क्रुर है मेरे कर्म, जो आज मैं तुझसे दूर हूँ।
कितने क्रुर है मेरे कर्म, जो आज मैं तुझसे दूर हूँ।
कितनी तेरी रहमत है फिर भी दूर न कर सके, कितने क्रुर हैं मेरे कर्म।
बहुत चाहा मन ललचाये कहीं, ओर तो ओर धीरे धीरे दूर होता जाऊँ तुझसे।
लाख रोके तु पर जो बेबस है मन, तो क्या करके पहुँचू पास तेरे।


- डॉ.संतोष सिंह