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Hymn No. 2967 | Date: 08-May-2005
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सोचो तो जरा एक खलनायक है पास जो खड़ा।
सोचो तो जरा एक खलनायक है पास जो खड़ा।
मारो तो खूब मारो, इतना की तड़पे पल पल पर न मरे।
एक एक पाप मिटेगा पीटने से, जो न बनती वो बात बनेगी।
रहम न करना नही तो हो जाओगे वंचित खुदा की रहमत से।
जब हाथ का मिला हो जाये खत्म, तो बातों का सिला देना।
एक के बाद एक सबके हाथों से जख्मों की कृपा करना।
हिचक आये तो मिटा देना, बेंहिचक तुम सौंप देना।
इतना कमजोर करना जो डर जाये, तुम्हारे मारने से मर जाये।
ये तो भलमनसाहत है, कि जो तुम्हारे हाथों को चोंट आयी।
सोचो जरा कितना कसूर है, जो इतना मार खाके प्रभु से दूर है हम।


- डॉ.संतोष सिंह