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Hymn No. 2980 | Date: 01-Jul-2005
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घन घना घन घन बरसे बरखा, छोड़े न किसी को भिगो जाये सबको।
घन घना घन घन बरसे बरखा, छोड़े न किसी को भिगो जाये सबको।
न जाने कहां से आये कब आ जाये, कोई जान न पाये।
लेके चले बादलों की बारात, आगे नाचे पवन हो मगन।
क्या अपना क्या पराया, सुखी धरा की प्यास बुझा जावे।
ऊसर हो बियाबान छोड़े न वो किसीको, भिगोये वो सबको।
मेघ मल्हार गावे, प्रेम राग सुनावे, तान दे जो कोयल कुहू कुहू की।
बादलों की उमड़ घुमड़ की थाप पे, मन हो या मयूर नाचे पंख फैलाये।
जो बात बनती नहीं वो बात बनती जाये, बिछुड़ हुये करीब आ जायें,
बदल जाये कुदरत का स्वरूप, जो हो जावे नवजीवन की शुरूआत।
रोके रुकता नहीं चाहे हो कोई कितना भी उदास मन, जो हो जावे शुरुवात बरखा की।
- डॉ.संतोष सिंह
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