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Hymn No. 2981 | Date: 01-Jul-2005
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अनजाने में हंसता हूँ न जाने क्यों खुश होता हूँ।
अनजाने में हंसता हूँ न जाने क्यों खुश होता हूँ।
तुझसे दूर रहते तुझसे ही बाते न जाने कैसे करता हूँ।
छुप छुपके तुझसे मिलता हूँ, मन ही मन मनुहार करता हूँ।
खुली आँखो से न जाने कैसे कल्पनाओं मैं विचरता हूँ।
गुस्सा खूब आता है, तेरे पास पहुँचते सब निकल जाता है।
मेरी सारी दलीलों को तू एक शब्द मैं क्यों फुस्स कर देता है।
जिद्द खूब करता हूँ, फिर भी एक न सुनता है।
न जाने कैसे फिर तेरा कहा करता हूँ, करने के बाद समझता हूँ।
तेरा अंदाज है कितना निराला, जब जब जाना तब पाया कुछ नया।
दूर रहते तू पास आता है, गम से भरी दुनिया मैं खुशियाँ तू दे जाता है।


- डॉ.संतोष सिंह