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Hymn No. 2982 | Date: 07-Jul-2005
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धधकती है आग सीने मैं, जो जलाये दिन रात मुझको।
धधकती है आग सीने मैं, जो जलाये दिन रात मुझको।
चैन न लेने दे पल भर को, जो न जले तो चैन न पाऊँ पलभर को।
याद दिलाये उसकी ओर तड़पाये, हम दोनों है वजूद एक के ओर दो पहचान।
कहर बरपाये दिन रात, मौन मैं भी कोहराम मचाये।
अनसुनी करूँ कितनी भी, सुन लूँ मैं कितनी भी, समझ न पाऊँ क्या करूँ मैं इसका।
आज कल मैं बीती जाये, ख्वाब के मानिंद जिंदगी गुजरती जाये।
जो नहीं तो नहीं जो हाँ तो हाँ, मेरी हालत क्यों है इतनी उलझी हुयी।
क्या करुँ ऐसा की तू मेरा हो जाये, उलझती जिंदगी सुलझती जाये।
जानके अनजान क्यों हूँ, करके न करने की कतार में क्यों हूँ।
उबार लो ऐ मेरे मौला, ऐसे हालातों से, तार लो मुझे मेरी मजबूरी से।
- डॉ.संतोष सिंह
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अनजाने में हंसता हूँ न जाने क्यों खुश होता हूँ।
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