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Hymn No. 2987 | Date: 18-Jul-2005
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दूसरों की बात कैसे करुँ, जो तेरे सिवाय दूसरा नजर आये।
दूसरों की बात कैसे करुँ, जो तेरे सिवाय दूसरा नजर आये।
मानो ना मानो यार जो तेरे सिवाय कुछ ओर अब न भाये।
ढंक ली हो जो आंखे तेरी सूरत ने, तो कैसे दुनिया को देख पाऊँ।
नजरों का खूलना हो या बंद होना, दिल मैं समायी तेरी मुर्ति का ही है दीदार होना।
तेरी एक अदा भरी मुस्कान् जो कौंधे, उसी मैं ढल जाये दिन मेरा।
मांगने को मांगना चाहूँ बहुत कुछ, जब कुछ मांगने जाऊँ तेरी याद आये।
इस दिल को अब तेरा ही प्यार भाये, जग में सब होते हुये तेरे बिन कुछ न सुहाये।
सोच के हर छोर पे तुम हो, मन को हो हर पल अहसास तेरा तो किसीका होना।
दूर की डगर पास अब नजर आये, जो हाथ पकड़के मजिल की ओर तू ले जाये।
जज्बा कायम है, तन का हो रोम रोम, या मन का कोई कोनां, दिल मैं हर पल तू ही तू होना।


- डॉ.संतोष सिंह