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Hymn No. 2989 | Date: 21-Jul-2005
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आ रहा है वख्त देखे हुये ख्वाबों को पूरा होने का।
आ रहा है वख्त देखे हुये ख्वाबों को पूरा होने का।
सदियों से सजाये हुये इच्छाओं का तुझमें विलीन होने का।
कब कैसे क्यों से भरे सवाल खत्म होते जायें तेरे पास आते आते।
मन की व्यथा की न रही कोई कथा, जो गाऊं गाथा तेरे प्रेम की।
प्रमाद से भरे जीवन में आमादा होते गया तेरे प्रेम पाने का।
अनजान न रहा कुछ, जो जान पहचान बढ़ती गयी, तुझसे।
पल पल तू ही तू तेरे सिवाय न सूझे अब कुछ ओर अब हमको।
चुप्पी बढ़ती जाये जो प्रियतम् संवाद कायम हुआ है तुझसे।
कैसे कहूँ अब ओर कुछ, जो तू न जानता हो मेरी या जहाँ की।
अर्पित क्या क्या करूँ तुझको जो समर्पित कर दिया खुद को।


- डॉ.संतोष सिंह